वह अपना मुंह धूल में रखे, कया जाने इस में कुछ आशा हो;
27पुरूष के लिये जवानी में जूआ उठाना भला है।
28वह यह जानकर अकेला चुपचाप रहे, कि परमेश्वर ही ने उस पर यह बोझ डाला है;
29वह अपना मुंह धूल में रखे, कया जाने इस में कुछ आशा हो;
30वह अपना गाल अपने मारनेवाले की ओर फेरे, और नामधराई सहता रहे।
इस पद को अन्य भाषाओं में भी पढ़ें