वह अपना गाल अपने मारनेवाले की ओर फेरे, और नामधराई सहता रहे।
28वह यह जानकर अकेला चुपचाप रहे, कि परमेश्वर ही ने उस पर यह बोझ डाला है;
29वह अपना मुंह धूल में रखे, कया जाने इस में कुछ आशा हो;
30वह अपना गाल अपने मारनेवाले की ओर फेरे, और नामधराई सहता रहे।
31क्योंकि प्रभु मन से सर्वदा उतारे नहीं रहता,
32चाहे वह दु:ख भी दे, तौभी अपनी करूणा की बहुतायत के कारण वह दया भी करता है;
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