उसकी घुड़की से आकाश के खम्भे थरथराकर चकित होते हैं।
9वह अपने सिंहासन के साम्हने बादल फैलाकर उसको छिपाए रखता है।
10उजियाले और अन्धियारे के बीच जहां सिवाना बंधा है, वहां तक उस ने जलनिधि का सिवाना ठहरा रखा है।
11उसकी घुड़की से आकाश के खम्भे थरथराकर चकित होते हैं।
12वह अपने बल से समुद्र को उछालता, और अपनी बुध्दि से घपणड को छेद देता है।
13उसकी आत्मा से आकाशमणडल स्वच्छ हो जाता है, वह अपने हाथ से वेग भागनेवाले नाग को मार देता है।
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