मेरी जड़ जल की ओर फैली, और मेरी डाली पर ओस रात भर पड़ी,
17मैं कुटिल मनुष्यों की डाढ़ें तोड़ डालता, और उनका शिकार उनके मुंह से छीनकर बचा लेता था।
19मेरी जड़ जल की ओर फैली, और मेरी डाली पर ओस रात भर पड़ी,
20मेरी महिमा ज्यों की त्यों बनी रहेगी, और मेरा धनुष मेरे हाथ में सदा नया होता जाएगा।
21लोग मेरी ही ओर कान लगाकर ठहरे रहते थे और मेरी सम्मति सुनकर चुप रहते थे।
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