वह सन के वस्त्रा बनाकर बेचती है; और व्योपारी को कमरबन्द देती है।
22वह तकिये बना लेती है; उसके वस्त्रा सूक्ष्म सन और बैंजनी रंग के होते हैं।
23जब उसका पति सभा में देश के पुरनियों के संग बैठता है, तब उसका सन्मान होता है।
24वह सन के वस्त्रा बनाकर बेचती है; और व्योपारी को कमरबन्द देती है।
25वह बल और प्रताप का पहिरावा पहिने रहती है, और आनेवाले काल के विषय पर हंसती है।
26वह बुद्धि की बात बोलती है, और उसके वचन कृपा की शिक्षा के अनुसार होते हैं।
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