उसकी बात का आरम्भ मूर्खता का, और उनका अन्त दुखदाई बावलापन होता है।
11यदि मंत्रा से पहिले सर्प डसे, तो मंत्रा पढ़नेवाले को कुछ भी लाभ नहीं।।
12बुद्धिमान के वचनों के कारण अनुग्रह होता है, परन्तु मूर्ख अपने वचनों के द्वारा नाश होते हैं।
13उसकी बात का आरम्भ मूर्खता का, और उनका अन्त दुखदाई बावलापन होता है।
15मूर्ख को परिश्रम से थकावट ही होती है, यहां तक कि वह नहीं जानता कि नगर को कैसे जाए।।
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