परन्तु यह मैं तेरे साम्हने सच ठहरा सकते हैं।
11और उन्हों ने मुझे न मन्दिर में न सभा के घरों में, न नगर में किसी से विवाद करते या भीड़ लगाते पाया।
12और न तो वे उन बातों को, जिन का वे अब मुझ पर दोष लगाते हैं, तेरे साम्हने सच ठहरा सकते हैं।
13परन्तु यह मैं तेरे साम्हने सच ठहरा सकते हैं।
15और परमेश्वर से आशा रखता हूं जो वे आप भी रखते हैं, कि धर्मी और अधर्मी दोनों का जी उठना होगा।
इस पद को अन्य भाषाओं में भी पढ़ें