चित्त लगाकर मेरी बात सुनो; और तुम्हारी शान्ति यही ठहरे।
2चित्त लगाकर मेरी बात सुनो; और तुम्हारी शान्ति यही ठहरे।
3मेरी कुछ तो सहो, कि मैं भी बातें करूं; और जब मैं बातें कर चुकूं, तब पीछे ठट्ठा करना।
4क्या मैं किसी मनुष्य की दोहाई देता हूँ? फिर मैं अधीर क्यों न होऊं?
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