मैं तो दोषी ठहरूंगा; फिर व्यर्थ क्यों परिश्रम करूं?
27जो मैं कहूं, कि विलाप करना झूल जाऊंगा, और उदासी छोड़कर अपना मन प्रफुल्लित कर दूंगा,
28तब मैं अपने सब दुखों से डरता हूँ। मैं तो जानता हूँ, कि तू मुझे निदष न ठहराएगा।
29मैं तो दोषी ठहरूंगा; फिर व्यर्थ क्यों परिश्रम करूं?
30चाहे मैं हिम के जल में स्नान करूं, और अपने हाथ खार से निर्मल करूं,
31तैभी तू मुझे गड़हे में डाल ही देगा, और मेरे वस्त्रा भी मुझ से घिनाएंगे।
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