मैं अन्धों के लिये आंखें, और लंगड़ों के लिये पांव ठहरता था।
13जो नाश होने पर था मुझे आशीर्वाद देता था, और मेरे कारण विधवा आनन्द के मारे गाती थी।
15मैं अन्धों के लिये आंखें, और लंगड़ों के लिये पांव ठहरता था।
17मैं कुटिल मनुष्यों की डाढ़ें तोड़ डालता, और उनका शिकार उनके मुंह से छीनकर बचा लेता था।
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