मैं गीदड़ों का भाई और शुतुर्मुग का संगी हो गया हूँ।
27मेरी अन्तड़ियां निरन्तर उबलती रहती हैं और आराम नहीं पातीं; मेरे दु:ख के दिन आ गए हैं।
29मैं गीदड़ों का भाई और शुतुर्मुग का संगी हो गया हूँ।
30मेरा चमड़ा काला होकर मुझ पर से गिरता जाता है, और तप के मारे मेरी हडि्डयां जल गई हैं।
31इस कारण मेरी वीणा से विलाप और मेरी बांसुरी से रोने की ध्वनि निकलती है।
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